नई दिल्ली, 27 अक्टूबर: अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर को रखा जाएगा। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए निर्जला व्रत रखती हैं और अहोई माता की पूजा करती हैं। करवा चौथ से अलग, अहोई अष्टमी का व्रत चांद देखकर नहीं बल्कि शाम को तारे देखकर खोला जाता है। यही इस व्रत की सबसे खास पहचान है।
परंपरा के अनुसार दिनभर व्रत रखने के बाद शाम को अहोई माता की पूजा की जाती है। पूजा में अहोई माता का चित्र, करवा, दीपक, फूल और फल रखे जाते हैं। महिलाएं एक साथ बैठकर अहोई अष्टमी की कथा सुनती हैं, जिसमें संतान के प्रति माता के प्रेम और त्याग की कहानी का वर्णन है। कथा के बाद माता को भोग लगाया जाता है और परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना की जाती है।
पूजा पूरी होने के बाद तारों के दिखने की प्रतीक्षा की जाती है। जैसे ही आकाश में तारे दिखाई देने लगते हैं, महिलाएं तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। कई घरों में पहले बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है और फिर सात्विक भोजन से पारण किया जाता है। मान्यता है कि तारों का दर्शन संतान के उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक है।
अहोई अष्टमी के दिन एक और परंपरा का पालन किया जाता है कि व्रत रखने वाली महिलाएं दिन में सोती नहीं हैं और पूजा तक पूरी श्रद्धा से नियमों का पालन करती हैं। शाम की पूजा के समय घर का वातावरण शांत और पवित्र रखा जाता है। संतान की मंगलकामना के इस व्रत में दिखावा नहीं, बल्कि माता के मन की सच्ची भावना ही सबसे बड़ा पुण्य मानी जाती है।
स्रोत: पंचांग और धार्मिक मान्यता

