नैनीताल, 27 अक्टूबर: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड और उसके संस्थापकों के खिलाफ चल रहे एक आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है। यह मामला कथित भ्रामक चिकित्सा विज्ञापनों से जुड़ा था। अदालत ने कहा कि मामले की कार्यवाही शुरू करने में गंभीर प्रक्रियात्मक खामियां रहीं, इसलिए संज्ञान और समन का आदेश टिक नहीं सकता।
यह फैसला न्यायमूर्ति विवेक भारती शर्मा ने सुनाया। अदालत के सामने आपराधिक विविध प्रार्थनापत्र संख्या 118/2025 था, जिसमें 16 अप्रैल 2024 के समन आदेश को रद्द करने और हरिद्वार के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में चल रहे आपराधिक मामला संख्या 3892/2024 की कार्यवाही को समाप्त करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के तहत यह प्रार्थनापत्र दायर किया था।
राज्य की ओर से दायर शिकायत में आरोप था कि आयुष मंत्रालय के पत्रों के आधार पर पतंजलि के कुछ उत्पादों, जिनमें मधुग्रिट, मधुनाशिनी और दिव्य लिपिडोम टैबलेट जैसे उत्पाद शामिल हैं, के विज्ञापन भ्रामक थे। इन विज्ञापनों पर औषधि और चमत्कारिक उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 की धारा 3 और 4 के तहत कार्रवाई की मांग की गई थी।
अदालत ने शिकायत की कमजोरी को रेखांकित करते हुए कहा कि शिकायत में यह आरोप ही नहीं लगाया गया था कि कथित विज्ञापन किस तरह और क्या झूठा था। अदालत के अनुसार शिकायत में इस बात का कोई कथन ही नहीं था कि विज्ञापन असत्य थे। इसके अलावा 16 अप्रैल 2024 के संज्ञान आदेश में ऐसा कोई अवलोकन नहीं था जिससे यह पता चले कि ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लेते समय अपने विवेक का प्रयोग किया था।
अदालत ने समय-सीमा के बिंदु पर भी ध्यान दिया। अदालत ने कहा कि अधिकांश अपराध कथित तौर पर 15 अप्रैल 2023 से पहले हुए थे, यानी संज्ञान लेने से एक वर्ष से अधिक पहले। ऐसे में समय-सीमा का सवाल भी कार्यवाही के रास्ते में खड़ा था। अदालत ने यह भी कहा कि जब अपराधकर्ता कंपनी हो तो निदेशकों पर परोक्ष दायित्व स्वतः नहीं थोपा जा सकता, जब तक कि किसी कानून में इसका स्पष्ट प्रावधान न हो। इस बिंदु पर अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के सुनील भारती मित्तल बनाम सीबीआई के फैसले का हवाला दिया।
अदालत ने व्यापार और व्यवसाय करने के मौलिक अधिकार का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत हर भारतीय नागरिक को कोई भी पेशा, व्यापार या व्यवसाय करने का अधिकार है, हालांकि इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिर्फ शिकायत दायर हो जाने से किसी व्यक्ति को अदालत में नहीं घसीटा जा सकता। संज्ञान लेने के लिए मजिस्ट्रेट का विवेक लगाना अनिवार्य है।
अंत में अदालत ने हरिद्वार के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के 16 अप्रैल 2024 के संज्ञान और समन आदेश को रद्द कर दिया, जो 1954 के अधिनियम की धारा 3, 4 और 7 के तहत पारित किया गया था।
आम उपभोक्ताओं के लिए इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि भ्रामक विज्ञापनों पर कार्रवाई नहीं हो सकती। इसका मतलब यह है कि ऐसी कार्रवाई कानून की तय प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए, जिसमें शिकायत में झूठ का स्पष्ट आरोप हो और संज्ञान लेते समय अदालत अपना विवेक लगाए। प्रक्रिया की यह सख्ती भविष्य में ऐसे मामलों की जांच और अभियोजन के तरीके को प्रभावित करेगी।
स्रोत: LawStreet Journal की खबर

