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छठ पूजा में खरना की विधि: गुड़-चावल की खीर का प्रसाद क्यों बनता है, जानें मान्यता

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नई दिल्ली, 22 अक्टूबर: छठ पूजा का दूसरा दिन खरना कहलाता है। 2026 में छठ का चार दिवसीय कार्यक्रम 13 से 16 नवंबर तक चलेगा — 13 नवंबर को नहाय-खाय, 14 नवंबर को खरना, 15 नवंबर को संध्या अर्घ्य और 16 नवंबर को उषा अर्घ्य होगा। खरना के दिन व्रती पूरे दिन निर्जला व्रत रखते हैं और शाम को विशेष प्रसाद तैयार किया जाता है।

खरना की विधि इस प्रकार है — शाम को व्रती स्नान करके साफ वस्त्र पहनते हैं। मिट्टी के चूल्हे या साफ रसोई में गुड़ और चावल की खीर बनाई जाती है, साथ में गेहूं के आटे की रोटियां सेंकी जाती हैं। खीर-रोटी का भोग पहले सूर्य देव को अर्पित किया जाता है, फिर व्रती स्वयं प्रसाद ग्रहण करते हैं और परिवार-परिचितों में बांटा जाता है। प्रसाद ग्रहण करने के बाद ही व्रती का 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है, जो उषा अर्घ्य के बाद समाप्त होता है।

गुड़-चावल की खीर का विशेष महत्व है। लोकमान्यता के अनुसार गुड़ सूर्य की ऊर्जा और मिठास का प्रतीक है, जबकि चावल पवित्रता और समृद्धि का। खीर को धीमी आंच पर प्रेम और भक्ति से पकाया जाता है — माना जाता है कि जितनी श्रद्धा से प्रसाद बनता है, उतनी ही कृपा सूर्य देव की मिलती है। खरना के प्रसाद को मांगकर खाने की भी परंपरा है, क्योंकि इसे महाप्रसाद माना जाता है। प्रसाद बनाते समय रसोई की पवित्रता का पूरा ध्यान रखा जाता है और कोई भी प्रसाद को जूठा नहीं करता।

स्रोत: लोक परंपरा, धार्मिक मान्यता