नई दिल्ली, 29 अक्टूबर: धनतेरस का पर्व शुक्रवार, 6 नवंबर को मनाया जाएगा। इस दिन धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी के साथ धन्वंतरि और कुबेर की पूजा होती है, लेकिन शाम को एक और परंपरा निभाई जाती है जिसे यमदीपदान कहा जाता है। इसमें घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक जलाया जाता है।
मान्यता के अनुसार यमदीपदान की परंपरा राजा हिम के पुत्र की कथा से जुड़ी है। कहा जाता है कि विवाह के चौथे दिन यमराज उनके प्राण लेने आए, लेकिन उनकी पत्नी ने रातभर दीपक जलाए रखे और यमराज के सामने सोने-चांदी के ढेर लगा दिए। दीपकों की रोशनी और पत्नी की भक्ति से प्रसन्न होकर यमराज बिना प्राण लिए लौट गए। तभी से धनतेरस की रात यम के नाम का दीपक जलाने की परंपरा चली आ रही है।
यमदीपदान की विधि सरल मानी जाती है। धनतेरस की शाम सरसों के तेल का दीपक तैयार करके उसे घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखकर जलाया जाता है। मान्यता है कि यह दीपक अकाल मृत्यु से रक्षा करता है और परिवार पर यम का भय नहीं रहता। कुछ परिवारों में आटे का चौमुखा दीपक भी जलाया जाता है।
दीपक जलाते समय यमराज से परिवार की रक्षा की प्रार्थना की जाती है। यह परंपरा बताती है कि धनतेरस केवल खरीदारी का पर्व नहीं, बल्कि जीवन और स्वास्थ्य की कामना का भी पर्व है।
स्रोत: धार्मिक मान्यता / पौराणिक कथा

