नई दिल्ली, 19 अक्टूबर: विजयादशमी के दिन जहां उत्तर भारत में रावण दहन होता है, वहीं दक्षिण भारत में यह दिन बच्चों की शिक्षा के शुभारंभ का पर्व है। केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में विजयादशमी पर ‘विद्यारंभम’ की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है। मान्यता है कि इस दिन शुरू की गई विद्या में मां सरस्वती की विशेष कृपा होती है।
विद्यारंभम की विधि के अनुसार विजयादशमी की सुबह बच्चे को स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। इसके बाद थाली में चावल फैलाकर उस पर बच्चे की उंगली पकड़कर ‘ॐ हरिः श्री’ या वर्णमाला के अक्षर लिखवाए जाते हैं। कई परिवारों में सोने की अंगूठी से या गुरु के मार्गदर्शन में यह संस्कार कराया जाता है। इसके बाद मां सरस्वती की पूजा की जाती है और गुरु को दक्षिणा दी जाती है।
इस परंपरा का संबंध नवरात्रि के अंतिम तीन दिनों से भी है। दक्षिण में इन दिनों पुस्तकों और वाद्य यंत्रों को मां सरस्वती के सामने रखकर उनकी पूजा की जाती है और विजयादशमी के दिन ही उन्हें वापस लिया जाता है। इसे ‘पुस्तक पूजा’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि ज्ञान के साधनों का पूजन करने से विद्या में वृद्धि होती है।
आज के समय में यह परंपरा केवल धार्मिक संस्कार नहीं रही, बल्कि बच्चों में पढ़ाई के प्रति सकारात्मक भाव जगाने का सुंदर माध्यम बन गई है। विजयादशमी के दिन नए कौशल सीखने की शुरुआत भी शुभ मानी जाती है।
स्रोत: धार्मिक मान्यता एवं लोक परंपरा

