गुरुग्राम। पिछले एक दशक में गुरुग्राम का चेहरा पूरी तरह बदल गया है — कंक्रीट करीब 64 प्रतिशत बढ़ा, जबकि जलाशयों और तालाबों का रकबा करीब 77 प्रतिशत घट गया है। संकला फाउंडेशन के एक नए अध्ययन में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है, जिसे हरियाणा लोक प्रशासन संस्थान (HIPA) में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किया गया।
आंकड़े बताते हैं कहानी
अध्ययन के मुताबिक शहर का बिल्ट-अप एरिया 2015 में 102.5 वर्ग किलोमीटर था, जो 2025 में बढ़कर 168.2 वर्ग किलोमीटर हो गया। वहीं जलाशयों का हिस्सा कुल भू-भाग का 4.65 प्रतिशत से घटकर महज 1.05 प्रतिशत रह गया। शहर में औसतन सालाना करीब 596 मिलीमीटर बारिश होती है, जिसमें से 85 प्रतिशत जून से सितंबर के मानसून में गिरती है — लेकिन ज्यादातर पानी नालियों में बह जाता है।
बाढ़ का बढ़ता खतरा
शहर के सभी 36 नगर वार्डों में किए गए करीब 600 साक्षात्कारों में 68.4 प्रतिशत लोगों ने जाम नालियों की शिकायत की। 27.7 प्रतिशत ने कहा कि जलभराव एक से तीन दिन तक रहता है और 4 प्रतिशत से ज्यादा लोगों के इलाकों में यह तीन दिन से भी ज्यादा टिका रहता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की श्रेणी में गुरुग्राम का बड़ा हिस्सा पहले से ‘अति-दोहित’ (ओवर-एक्सप्लॉइटेड) है।
हाईकोर्ट भी चिंतित
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भी गुरुग्राम के जल संकट पर चिंता जताते हुए सुधारात्मक उपायों के सुझाव मांगे हैं और डीसी गुरुग्राम समेत अधिकारियों को सुनवाई में पेश होने को कहा था। अध्ययन भारत-डेनमार्क ग्रीन रणनीतिक साझेदारी के तहत डेनमार्क दूतावास के सहयोग से किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि तालाबों के पुनर्जीवन के बिना शहरी बाढ़ और जल संकट दोनों गहराते जाएंगे।

