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आखिर सात जन्मों का साथ निभाने की कसमें खाने वाले जोड़े, एक-दूसरे की जान के दुश्मन क्यों बन रहे हैं?

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भूदेव भगलिया, वरिष्ठ संवाददाता

पुणे में केतन अग्रवाल की खौफनाक हत्या ने एक बार फिर पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। पति-पत्नी का रिश्ता, जिसे भारतीय समाज में सबसे पवित्र और भरोसेमंद माना जाता है, आज शक और साजिशों की बलि चढ़ रहा है। केतन अग्रवाल की घटना कोई अपवाद नहीं है। इससे पहले मेरठ में सौरभ राजपूत और इंदौर के राजा रघुवंशी की जिस तरह उनकी नव-नवेली पत्नियों द्वारा हत्या कर दी गई, वह समाज के माथे पर एक गहरा सवालिया निशान है। जिन हाथों की मेहंदी अभी ठीक से सूखी भी नहीं थी, वे खून से कैसे सन गए? आखिर सात जन्मों का साथ निभाने की कसमें खाने वाले जोड़े, एक-दूसरे की जान के दुश्मन क्यों बन रहे हैं?

आज इस गंभीर विषय पर समाज के हर वर्ग को रुककर आत्ममंथन करने की जरूरत है।

पसंद की शादियां और घटती सहनशीलता

एक समय था जब शादियां माता-पिता की मर्जी से होती थीं। अक्सर लड़का और लड़की एक-दूसरे को ठीक से जानते तक नहीं थे, फिर भी वे रिश्ते जीवन भर चलते थे। सुख-दुख में दोनों एक-दूसरे का संबल बनते थे। लेकिन आज हालात बिल्कुल उलट हैं। आज युवा अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुन रहे हैं। महीनों और सालों तक एक-दूसरे को समझने का दावा किया जाता है, लेकिन शादी के कुछ ही समय बाद यह तथाकथित ‘समझ’ या तो तलाक के दरवाजे पर पहुंच जाती है या फिर खौफनाक अपराध (Crime) में तब्दील हो जाती है।

आखिर अपनी पसंद से चुने गए जीवनसाथी से इतनी जल्दी नफरत क्यों हो जाती है? इसका सबसे बड़ा कारण है—सहनशीलता और समर्पण का खत्म होना। आज के दौर में रिश्ते भावनाओं की बजाय सुविधा (convenience) और अहंकार (Ego) की तराजू पर तौले जा रहे हैं। ‘मैं क्यों झुकूं?’ की जिद ने परिवार नाम की संस्था की नींव हिला दी है।

क्या हम बच्चों को समय नहीं दे पा रहे?

इन हिंसक प्रवृत्तियों की जड़ें हमारे घरों और हमारी परवरिश में छिपी हैं। आधुनिक जीवनशैली की अंधी दौड़ में माता-पिता पैसा कमाने और भौतिक सुख-सुविधाएं जुटाने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि वे बच्चों को ‘समय’ देना ही भूल गए हैं।

बच्चे के मन में क्या चल रहा है? उसकी भावनाएं क्या हैं? वह किस मानसिक द्वंद्व से गुजर रहा है? यह जानने की फुरसत आज न तो पिता के पास है और न ही माता के पास। नतीजतन, बच्चे भावनात्मक रूप से खोखले और आक्रामक होते जा रहे हैं। जब बच्चों को घर में सही संवाद (Communication) और संस्कार नहीं मिलते, तो वे विपरीत परिस्थितियों का सामना करना नहीं सीख पाते। यही वजह है कि जब वैवाहिक जीवन में थोड़ी सी भी अनबन या संघर्ष आता है, तो वे उसे सुलझाने के बजाय शॉर्टकट तलाशते हैं, जो कई बार हत्या जैसी खौफनाक साजिशों तक पहुंच जाता है।

आभासी दुनिया और समाज की नई कुरीतियां

सोशल मीडिया और टीवी सीरियल्स की आभासी दुनिया ने भी रिश्तों को खोखला करने में बड़ी भूमिका निभाई है। वहां दिखाई जाने वाली ‘परफेक्ट लाइफ’ की चाह में युवा अपने असल जीवन साथी से अवास्तविक उम्मीदें पाल लेते हैं। जब असल जिंदगी में वे उम्मीदें पूरी नहीं होतीं, तो निराशा जन्म लेती है। इसके अलावा, समाज में विवाह के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी कम हुआ है। एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स, लालच और रातों-रात अमीर बनने की चाहत ने रिश्तों की पवित्रता को बाजारू बना दिया है।

क्या है समाधान?

इन घटनाओं को सिर्फ ‘क्राइम न्यूज़’ मानकर पन्ने पलट देना हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। यह समाज के बीमार होने का अलार्म है। हमें समझना होगा कि परिवार की मजबूती ही सुरक्षित समाज की गारंटी है।

माता-पिता को यह समझना होगा कि बच्चों को महंगे गैजेट्स या लग्जरी लाइफ से ज्यादा उनके समय, साथ और सही मार्गदर्शन की जरूरत है। बच्चों में धैर्य, त्याग और विपरीत विचारों को सुनने की आदत डालनी होगी। विवाह से पहले युवाओं को यह समझाना होगा कि शादी कोई कॉन्ट्रैक्ट या फिल्म नहीं है, यह एक जिम्मेदारी है जिसमें उतार-चढ़ाव आना तय है। अगर हम अब भी नहीं चेते और रिश्तों की अहमियत को नहीं समझा, तो समाज में ऐसी घटनाएं बढ़ती ही जाएंगी और हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर जाएंगे जहां अपनों पर ही भरोसा करना सबसे बड़ा जोखिम बन जाएगा।

वक्त आ गया है कि हम अपनी जड़ों की ओर लौटें और रिश्तों को ‘अहंकार’ से नहीं, ‘संस्कार’ से सींचें।

लेखक जागरूक यूथ न्यूज के संपादक है