मयंक त्रिगुण, ब्यूरो चीफ
हाइलाइट्स (Highlights):
- 3 जुलाई से शुरू हुई अमरनाथ यात्रा में बढ़ते तापमान का असर, महज 5 दिन बाद (7 जुलाई को) ही पूरी तरह पिघला प्राकृतिक हिमलिंग।
- मुरादाबाद के चौरासी घंटा, सिविल लाइंस और दाऊ दयाल खन्ना नगर से गए कई जत्थों को खाली गुफा देखकर लौटना पड़ा मायूस।
- खराब मौसम और जलवायु परिवर्तन ने छीनी आस्था; कुछ खुशनसीब श्रद्धालुओं को ही नसीब हुए बाबा के अंतिम एक फीट स्वरूप के दर्शन।
विस्तृत खबर (Full Story):
मुरादाबाद/पहलगाम। जिन पैरों में छालों की परवाह किए बिना बाबा बर्फानी के दीदार की बेताबी थी, वे आज भारी मन और नम आंखों से वापस लौटने को मजबूर हैं। दक्षिण कश्मीर हिमालय में 3 जुलाई से शुरू हुई 57 दिवसीय पवित्र अमरनाथ यात्रा को अभी महज पांच दिन ही बीते थे कि 7 जुलाई को बाबा बर्फानी (पवित्र हिमलिंग) अंतर्ध्यान (लुप्त) हो गए। मौसम की बेरुखी और बढ़ते तापमान ने उस अलौकिक शिवलिंग को अपनी आगोश में ले लिया, जिसके दर्शन के लिए मुरादाबाद सहित देशभर से लाखों भक्त महीनों तैयारियां करते हैं।
खौफ पर भारी थी आस्था, लेकिन मौसम ने दिया धोखा यह वही पवित्र यात्रा है, जिसके लिए श्रद्धालु हर डर को पीछे छोड़ देते हैं। पिछले साल 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले का खौफ भी शिवभक्तों के कदम नहीं डिगा सका था। चप्पे-चप्पे पर मुस्तैद सुरक्षाबलों के बीच मुरादाबाद के चौरासी घंटा, पुराना दसवां घाट, सिविल लाइंस, मानसरोवर कालोनी और दाऊ दयाल खन्ना नगर के श्रद्धालु पूरे जोश के साथ रवाना हुए थे। लेकिन, जलवायु परिवर्तन की इस कड़वी मार ने कई भक्तों की मुराद अधूरी ही छोड़ दी।
विज्ञान और आस्था: क्यों पिघला शिवलिंग? अमरनाथ गुफा में बनने वाला शिवलिंग कोई साधारण बर्फ नहीं है। विज्ञान की भाषा में यह एक प्राकृतिक ‘आइस स्टैलग्माइट’ (Ice Stalagmite) है। गुफा की छत से टपकने वाली बूंदें जब जमा देने वाली ठंड में नीचे गिरती हैं, तो जमीन से ऊपर की ओर एक भव्य शिवलिंग का आकार ले लेती हैं। इस बार खराब मौसम और लगातार बढ़ते ग्लोबल तापमान के कारण गुफा के अंदर की गर्मी बढ़ गई, जिससे यह प्राकृतिक संरचना बेहद तेजी से पिघल गई।
कुछ खुशनसीब तो कई के हिस्से आई मायूसी ग्लोबल वार्मिंग के इस असर ने मुरादाबाद के श्रद्धालुओं की किस्मत को दो हिस्सों में बांट दिया:
- जिन्हें मिले दर्शन: ‘दि बार एसोसिएशन एंड लाइब्रेरी’ के अध्यक्ष आनंद मोहन गुप्ता, अपने साथी अधिवक्ता पुष्प यादव और अन्य सहयोगियों के साथ बालटाल मार्ग से समय रहते गुफा तक पहुंचने में सफल रहे। उन्होंने बेहद भावुक होकर बाबा के उस अंतिम एक फीट के स्वरूप के दर्शन किए और खुद को धन्य माना।
- जो रह गए मायूस: दूसरी ओर, सिविल लाइंस और शहर के अन्य इलाकों से निकले कई जत्थे जब तक दुर्गम रास्तों को पार कर गुफा के करीब पहुंचे, तब तक बाबा अंतर्ध्यान हो चुके थे। कड़कड़ाती ठंड और पहाड़ों की कठिन चढ़ाई पार करने के बाद खाली गुफा को देखना इन श्रद्धालुओं के लिए किसी बड़े सदमे से कम नहीं था।
भक्त भले ही मायूस हैं, लेकिन उनके होंठों पर अब भी यही शब्द हैं कि बाबा का बुलावा शायद अगली बार फिर आएगा। यह त्रासदी एक साफ और कड़वा इशारा भी करती है कि इंसानी गलतियों से बदल रहा पर्यावरण अब हमारी सदियों पुरानी आस्थाओं को भी हमसे छीन रहा है।