नई दिल्ली, 29 अक्टूबर: करवा चौथ पर सोलह श्रृंगार का विशेष महत्व है। मान्यता है कि करवा चौथ के दिन पूरी श्रद्धा से सोलह श्रृंगार करने वाली सुहागिन पर करवा माता की कृपा बनी रहती है और उसके पति को लंबी उम्र का आशीर्वाद मिलता है। सोलह श्रृंगार केवल सजावट नहीं, बल्कि सौभाग्य और सुहाग के प्रतीक माने जाते हैं।
सोलह श्रृंगार में बिंदी, सिंदूर, काजल, नथ, कर्णफूल, मेहंदी, चूड़ियां, कंगन, अंगूठी, हार, बाजूबंद, कमरबंद, बिछिया, पायल, महावर और गजरा शामिल होते हैं। हर श्रृंगार के पीछे एक मान्यता जुड़ी है। माथे की बिंदी सौभाग्य और एकाग्रता का प्रतीक मानी जाती है, तो मांग का सिंदूर सुहाग की निशानी कहलाता है। हाथों की मेहंदी का रंग जितना गहरा चढ़े, पति का प्रेम उतना गहरा माना जाता है।
पैरों की बिछिया और पायल की छनक को घर में सुख-शांति का संकेत माना जाता है, जबकि नथ और कर्णफूल स्त्री के सौंदर्य के साथ-साथ आध्यात्मिक संतुलन से भी जोड़े जाते हैं। करवा चौथ की शाम महिलाएं लाल या गुलाबी वस्त्र पहनकर, पूरी श्रृंगार के साथ पूजा में बैठती हैं। कहा जाता है कि अधूरे श्रृंगार से पूजा का फल अधूरा रहता है, इसलिए पारंपरिक रूप से सभी सोलह श्रृंगार पूरे किए जाते हैं।
आज के समय में कामकाजी महिलाएं सुविधा के अनुसार श्रृंगार करती हैं, लेकिन आस्था का भाव वही रहता है। श्रृंगार का असली अर्थ पति के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना से जुड़ा माना जाता है।
स्रोत: धार्मिक मान्यता / परंपरा

