नई दिल्ली, 29 अक्टूबर: अहोई अष्टमी का व्रत रविवार, 1 नवंबर को रखा जाएगा। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को तारे देखकर व्रत खोलती हैं। पूजा सही विधि से संपन्न हो, इसके लिए पूजा की थाली पहले से तैयार रखना जरूरी माना जाता है।
अहोई अष्टमी की पूजा सामग्री में सबसे पहले अहोई माता का चित्र या चांदी की अहोई आती है, जिसकी पूजा की जाती है। इसके साथ कलश या करवा, दीपक, रोली, अक्षत, चंदन, पुष्प, धूप और कपूर रखे जाते हैं। भोग के लिए मिठाई, फल, सिंघाड़ा और दूध से बनी चीजें रखी जाती हैं। व्रत कथा की पुस्तक या कथा का पाठ भी थाली के पास रखा जाता है।
परंपरा के अनुसार पूजा में स्याऊ माता के चित्र के साथ सात अनाज और कुछ सिक्के भी रखे जाते हैं। दीपक में घी या तेल डालकर पूजा स्थान को सजाया जाता है। महिलाएं पूजा से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनती हैं और फिर अहोई माता की कथा सुनती हैं।
शाम को तारे निकलने पर अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। कुछ परिवारों में चंद्रमा के दर्शन के बाद पारण की परंपरा भी है। सामग्री की सूची पहले से तैयार रखने से पूजा में कोई बाधा नहीं आती और व्रत शांतिपूर्वक संपन्न होता है।
स्रोत: धार्मिक मान्यता / परंपरा

