नई दिल्ली, 22 अक्टूबर: करवा चौथ का नाम ही मिट्टी के करवे से जुड़ा है। संस्कृत में करवा को ‘करक’ कहा जाता है, इसलिए इस व्रत का एक नाम करक चतुर्थी भी है। परंपरा के अनुसार सुहागिनें इस दिन मिट्टी का करवा पानी से भरकर रखती हैं और रात को चांद निकलने पर उसी करवे से चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं। माना जाता है कि करवे का जल चंद्रमा की शीतलता और जीवनदायिनी शक्ति का प्रतीक है।
अर्घ्य की विधि इस प्रकार है — चांद दिखाई देने पर छलनी से चंद्रमा के दर्शन करें, फिर करवे से जल की धारा छोड़ते हुए चंद्रमा को अर्घ्य दें। इसके बाद पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोला जाता है। कई परिवारों में सास-बहू के बीच करवे का आदान-प्रदान भी होता है, जिसे बायना की परंपरा से जोड़ा जाता है। करवे पर स्वास्तिक या शुभ-लाभ के चिह्न बनाने का भी रिवाज है।
लोकमान्यता के अनुसार मिट्टी का करवा धरती के तत्व का प्रतीक है और उसमें भरा जल चंद्रमा की अमृतमयी किरणों से जुड़ता है। व्रत की कथा में भी करवे का उल्लेख मिलता है — कहा जाता है कि वीरावती ने अपने भाइयों के छल के कारण समय से पहले ही करवे से चांद को अर्घ्य दे दिया था। इसलिए सही समय पर, चांद देखकर ही अर्घ्य देने का नियम बना। करवा चौथ की खरीदारी में करवा, छलनी और थाली पहले से तैयार रखने की सलाह दी जाती है ताकि 29 अक्टूबर की शाम की पूजा में कोई बाधा न आए।
स्रोत: धार्मिक मान्यता, लोक परंपरा

