डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। आज 4 अक्टूबर को 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत 96.33 रुपये पर पहुंच गई है। पिछले एक हफ्ते में रुपया 0.34 रुपये, एक महीने में 1.90 रुपये (+1.97 प्रतिशत) और एक साल में 7.59 रुपये (+7.88 प्रतिशत) कमजोर हुआ है — पिछले साल आज के दिन डॉलर 88.74 रुपये का था।
रुपये की कमजोरी की बड़ी वजहें हैं — कच्चे तेल के ऊंचे दाम, डॉलर की वैश्विक मजबूती और विदेशी निवेशकों की भारतीय बाजार से निकासी। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए डॉलर महंगा होने पर तेल का आयात बिल बढ़ जाता है।
इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है। पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने का दबाव बनता है, आयातित मोबाइल-लैपटॉप और इलेक्ट्रॉनिक्स महंगे होते हैं, और विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों की फीस (जो डॉलर में देनी होती है) का बोझ बढ़ जाता है।
हालांकि एक वर्ग को इससे फायदा भी होता है — विदेश में काम करने वाले भारतीयों के परिवार। भारत को हर साल 120 अरब डॉलर से ज्यादा का विदेशी पैसा (रेमिटेंस) मिलता है, और कमजोर रुपये में परिवारों को हर डॉलर के बदले ज्यादा रुपये मिलते हैं। विदेश यात्रा या पढ़ाई की योजना बना रहे लोग अपने बजट में 8 से 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी मानकर चलें।

