नई दिल्ली, 26 अक्टूबर: देश के बड़े मीडिया संस्थानों ने प्राइवेसी कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, और यह खबर सोमवार को सबसे ज्यादा चर्चा में रही। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की 26 अक्टूबर की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, 21 समाचार प्रकाशकों ने इस कानून को चुनौती दी है। इनमें उद्योगपति मुकेश अंबानी और गौतम अडानी से जुड़ी कंपनियों के मीडिया संस्थान भी शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला मंगलवार को सुनवाई के लिए आ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की ओर से 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में एक गोपनीय याचिका दायर की गई थी, जो अब पहली बार सामने आई है। प्रकाशकों का कहना है कि सरकार ने पिछले साल डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए प्राइवेसी कानून लागू करने की घोषणा की थी, जिससे Meta और Google जैसे प्लेटफॉर्म पर अनुपालन की जिम्मेदारियां बढ़ गईं। लेकिन मीडिया संस्थानों को इसमें छूट नहीं दी गई, जिसे प्रकाशकों ने प्रेस की आजादी पर हमला बताया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त में सरकार के साथ हुई बैठक में प्रकाशकों को आश्वासन दिया गया था कि प्रेस की आजादी की रक्षा की जाएगी। लेकिन प्रकाशकों का कहना है कि लिखित छूट न होना चिंता की बात है। यूरोपीय संघ, सिंगापुर और ब्रिटेन में पत्रकारों के लिए इस तरह की छूट का उदाहरण देते हुए याचिका में कहा गया है कि भारत में ऐसी स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। प्रकाशकों की मांग है कि कानून के विवादास्पद प्रावधानों में से अधिकांश को रद्द किया जाए, जो मई 2027 से लागू होने वाले हैं।
याचिका में उठाई गई आशंकाएं आम पाठकों के लिए भी अहम हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रकाशकों का कहना है कि यह कानून किसी पत्रकार को जांच से पहले संबंधित व्यक्ति की पूर्व सहमति लेने के लिए मजबूर कर सकता है और प्रकाशकों को खबरें हटाने के लिए भी कहा जा सकता है। इसके अलावा, जानकारी मांगने की शक्तियों से पत्रकारों के सूत्रों का खुलासा होने का खतरा भी बताया गया है। अगर सूत्र सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो भ्रष्टाचार या गलत कामों की जांच वाली खबरें सामने आना मुश्किल हो जाएगा, और इसका सीधा असर पाठकों तक पहुंचने वाली जानकारी पर पड़ेगा।
इस मामले की एक और खास बात यह है कि यह चुनौती सरकार से आमतौर पर नजदीक माने जाने वाले कारोबारी घरानों से जुड़े मीडिया संस्थानों की ओर से आई है। विपक्षी दल अक्सर यह आरोप लगाते रहे हैं कि अंबानी और अडानी को सरकार से अनुकूल व्यवहार मिलता है, हालांकि कारोबारी घरानों और सरकार ने इन आरोपों का हमेशा खंडन किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस पर DNPA या मंत्रालय की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
आम पाठकों के लिए इस खबर का मतलब सीधा है। अगर अदालत प्रकाशकों की दलीलों को मानती है, तो जांच पत्रकारिता के लिए सुरक्षा की गुंजाइश बढ़ सकती है। अगर कानून जस का तस लागू होता है, तो मीडिया संस्थानों को डेटा सुरक्षा नियमों के तहत नए सिरे से अपनी कार्यप्रणाली बदलनी होगी। किसी भी सूरत में, पाठकों को यह समझना जरूरी है कि खबरों की विश्वसनीयता और सूत्रों की सुरक्षा आपस में जुड़ी हुई हैं। यही वजह है कि यह मामला सिर्फ मीडिया कंपनियों का नहीं, बल्कि सूचना पाने के अधिकार से भी जुड़ा है।
स्रोत: रॉयटर्स की 26 अक्टूबर की रिपोर्ट

