नई दिल्ली, 27 अक्टूबर: गोवर्धन पूजा दिवाली के अगले दिन मनाई जाती है। अधिकांश क्षेत्रों में यह पर्व 9 नवंबर को मनाया जाएगा, जबकि कुछ क्षेत्रों में 10 नवंबर को भी गोवर्धन पूजा की परंपरा है। इस दिन का सबसे बड़ा आकर्षण अन्नकूट होता है, जिसमें भगवान को छप्पन भोग लगाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अन्नकूट में 56 ही भोग क्यों लगाए जाते हैं?
कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया था। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने लगातार सात दिन तक पर्वत उठाए रखा और इस दौरान उन्होंने अन्न ग्रहण नहीं किया। सात दिन बाद जब पर्वत नीचे रखा गया तो ब्रजवासियों ने सात दिन के आठ-आठ प्रहर का भोजन एक साथ अर्पित किया। सात गुणा आठ बराबर छप्पन हुआ, इसलिए तब से अन्नकूट में 56 प्रकार के भोग लगाने की परंपरा चली आ रही है।
अन्नकूट की विधि भी बड़ी खास होती है। गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाकर उसकी पूजा की जाती है और उसके सामने अन्न, सब्जियों, दाल, चावल, रोटी, मिठाई और फलों से बने व्यंजन सजाए जाते हैं। मंदिरों में यह भोग बड़े उत्साह से तैयार किया जाता है और पूजा के बाद प्रसाद के रूप में भक्तों में बांटा जाता है। मान्यता है कि अन्नकूट का प्रसाद ग्रहण करने से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।
गोवर्धन पूजा हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश भी देती है। गोवर्धन पर्वत, गाय और खेत ब्रज की जीवनरेखा थे और श्रीकृष्ण ने उनकी रक्षा करके यह सिखाया कि प्रकृति की पूजा ही सच्ची पूजा है। इसलिए इस गोवर्धन पूजा पर अन्नकूट के 56 भोग के पीछे छिपी इस कथा को याद करें और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करें।
स्रोत: पंचांग और धार्मिक मान्यता

