नई दिल्ली, 19 अक्टूबर: करवा चौथ पर सुहागिन महिलाओं का सोलह श्रृंगार करना विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि इस दिन पूर्ण श्रृंगार करके व्रत रखने से पति की लंबी उम्र होती है और दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि आती है। करवा चौथ से एक-दो दिन पहले हाथों में मेंहदी रचाने की परंपरा भी इसी श्रृंगार का हिस्सा है।
सोलह श्रृंगार में सिंदूर, बिंदी, काजल, मेंहदी, महावर, चूड़ियां, पायल, बिछिया, नथ, मांग टीका, झुमके, हार, बाजूबंद, अंगूठी, कमरबंद और गजरा शामिल माने गए हैं। हर श्रृंगार का अपना अर्थ है — सिंदूर सुहाग की निशानी है, चूड़ियां सौभाग्य का प्रतीक हैं, पायल और बिछिया गृहस्थ जीवन की मर्यादा दर्शाते हैं, तो मेंहदी प्रेम और समृद्धि का संकेत मानी गई है।
मेंहदी को लेकर मान्यता है कि जिसका रंग जितना गहरा चढ़ता है, उसे पति का उतना ही अधिक स्नेह मिलता है। पैरों में लगाए जाने वाले महावर को सुहागिनों का विशेष श्रृंगार माना गया है। करवा चौथ की शाम को महिलाएं सज-धजकर एकत्र होती हैं, कथा सुनती हैं और चांद का इंतजार करती हैं।
आज के समय में कामकाजी महिलाएं भी इस परंपरा को पूरे उत्साह से निभाती हैं। सोलह श्रृंगार केवल बाहरी सज्जा नहीं, बल्कि सुहाग के प्रति समर्पण और पारिवारिक सुख की कामना का प्रतीक माना गया है।
स्रोत: धार्मिक मान्यता एवं लोक परंपरा

