नई दिल्ली, 20 अक्टूबर: इस वर्ष दिवाली 8 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी और यह तिथि कार्तिक मास की अमावस्या है। लक्ष्मी पूजन की धूम के बीच एक प्राचीन परंपरा अक्सर छूट जाती है — अमावस्या के दिन पितरों के नाम दीपदान करना। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अमावस्या तिथि पितरों को समर्पित होती है, इसलिए दिवाली की रात दीये जलाने से पहले पितरों का स्मरण करना शुभ माना जाता है।
परंपरा के अनुसार, शाम को घर के मुख्य द्वार, आंगन या नदी-तालाब के किनारे पितरों के नाम का एक दीया जलाया जाता है। इस दीये को दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखने का विधान है, क्योंकि दक्षिण दिशा पितरों की दिशा मानी जाती है। दीया जलाते समय पितरों का ध्यान करके परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।
कुछ क्षेत्रों में इसे ‘यम का दीया’ भी कहा जाता है, जो धनतेरस से दिवाली तक जलाया जाता है। मान्यता है कि पितरों के आशीर्वाद के बिना लक्ष्मी पूजन का पूर्ण फल नहीं मिलता। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि पहले पितृ स्मरण, फिर लक्ष्मी-गणेश पूजन करें। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि दिवाली केवल वर्तमान की खुशी नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का पर्व भी है।
स्रोत: धार्मिक मान्यता और लोक परंपरा

