भूदेव भगलिया, संपादक
बदलती हवाओं का संकेत कैलेंडर का पन्ना पलटते ही जब साल 2026 की पहली किरण ने दस्तक दी, तो भारत की सड़कों का नजारा बदला हुआ था। दिल्ली से लेकर मुंबई तक की सड़कों पर लगा जाम इस बार नैनीताल या मसूरी की पहाड़ियों की ओर नहीं, बल्कि अयोध्या, काशी, मथुरा और खाटू श्याम की गलियों की ओर था। दशकों तक हमने देखा कि नए साल का मतलब केवल क्लब, डीजे, और पहाड़ों की वादियों में शोर-शराबा होता था। लेकिन आज का भारत अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है। श्हैप्पी न्यू ईयरश् अब श्जय श्री रामश्, श्राधे-राधेश् और श्जय श्री श्यामश् के उद्घोष में विलीन हो रहा है। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि एक महान सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है।
अयोध्या और काशी- आस्था के नए केंद्र
अयोध्या में रामलला की भव्य उपस्थिति ने पूरे देश के मानस पटल को बदल दिया है। नए साल के मौके पर अयोध्या में उमड़ा लाखों का जनसैलाब यह बताता है कि अब युवा पीढ़ी के लिए राम का नाम केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके गौरव का हिस्सा बन चुका है। बनारस के घाटों पर होने वाली गंगा आरती अब केवल पर्यटकों के लिए श्शोश् नहीं रही, बल्कि नए साल के संकल्प का केंद्र बन गई है। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के बाद से जिस तरह से श्रद्धालुओं की संख्या में करोड़ों का इजाफा हुआ है, उसने पर्यटन के पुराने मानकों को ध्वस्त कर दिया है। लोग अब नैनीताल की मॉल रोड पर टहलने के बजाय काशी की तंग गलियों में महादेव के दर्शन कर खुद को धन्य मान रहे हैं।
खाटू श्याम और मेहंदीपुर बालाजी- युवाओं का नया विश्वास
राजस्थान के सीकर स्थित खाटू श्याम मंदिर और मेहंदीपुर बालाजी में नए साल पर जो भीड़ देखी गई, वह समाजशास्त्रियों के लिए शोध का विषय है। चौंकाने वाली बात यह है कि इन कतारों में खड़े 70 प्रतिशत लोग युवा हैं। वह युवा जिसे कल तक श्वेस्टर्न कल्चरश् का पिछलग्गू समझा जाता था, आज माथे पर तिलक लगाए, हाथों में श्याम ध्वजा लिए मीलों पैदल चल रहा है। श्हारे का सहाराश् के जयकारे अब पब और डिस्को के संगीत से ज्यादा ऊंचे सुनाई दे रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता के इस दौर में मानसिक शांति की तलाश व्यक्ति को अध्यात्म की ओर खींच रही है।
वैष्णो देवी- पहाड़ों की पुकार अब भक्तिमय
कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक यही हाल है। माता वैष्णो देवी के दरबार में नए साल पर हाजिरी लगाना अब एक परंपरा बन गई है। पहले लोग पहाड़ों पर केवल बर्फ देखने जाते थे, लेकिन अब वे पहाड़ों पर श्शक्तिश् की खोज में जा रहे हैं। भवन पर उमड़ने वाली भीड़ और सुरक्षा बलों द्वारा किए गए इंतजाम यह बताते हैं कि श्रद्धा का यह सैलाब किसी भी आधुनिक सुख-सुविधा से कहीं बड़ा है।
मथुरा-वृंदावन- भक्ति का चरम
ब्रज की रज में जो आनंद है, वह दुनिया के किसी पांच सितारा रिसॉर्ट में नहीं। मथुरा और वृंदावन की गलियों में नए साल पर पैर रखने की जगह नहीं थी। बांके बिहारी के दर्शन के लिए घंटों इंतजार करना अब लोगों के लिए कष्ट नहीं, बल्कि तपस्या जैसा है। युवा अब क्लबों में नाचने के बजाय श्हरि नाम संकीर्तनश् पर झूमना पसंद कर रहे हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया है, बल्कि यह उस खोए हुए आत्मसम्मान की वापसी है जो भारतीय समाज लंबे समय से खोज रहा था।
क्या नैनीताल और शिमला अपनी चमक खो रहे हैं?
यह कहना गलत होगा कि लोग पहाड़ों पर जाना भूल गए हैं, लेकिन यह सच है कि पहाड़ों पर जाने का श्मकसदश् बदल गया है। अब लोग केवल घूमने के लिए नहीं, बल्कि वहां के प्राचीन मंदिरों और एकांत की तलाश में जा रहे हैं। श्मदिरा से मंदिरश् तक का यह सफर भारतीय समाज की परिपक्वता को दर्शाता है। नैनीताल और मनाली की भीड़ अब हरिद्वार और ऋषिकेश के घाटों पर शिफ्ट हो रही है।
एक गौरवशाली भविष्य की आहट
नए साल पर धार्मिक स्थलों पर उमड़ा यह जनसैलाब एक संदेश हैकृभारत अब अपनी पहचान को लेकर शर्मिंदा नहीं है। वह अपनी परंपराओं को आधुनिकता के साथ जोड़कर आगे बढ़ रहा है। अयोध्या से लेकर बनारस तक और खाटू श्याम से लेकर वैष्णो देवी तक, यह भीड़ केवल इंसानों की नहीं, बल्कि अटूट विश्वास की है। यह नया भारत है, जो तकनीक में दुनिया से आगे रहना चाहता है, लेकिन जिसका दिल आज भी अपनी सनातनी परंपराओं के लिए धड़कता है।
- नव वर्ष पर आधुनिकता की चकाचौंध छोड़, श्री बाला जी और श्याम के दरबार में उमड़ा नया भारत
- Moradabad Accident: मुरादाबाद में दर्दनाक हादसा, दो सगी बहनों की ट्रेन से कटकर मौत
- 8th Pay Commission 2026 से बढ़ जाएगी कर्मचारियों की सैलरी? जानें यहां
- मुरादाबाद में पुलिस ने बनाया मेगा प्लान हुड़दंगियों पर होगी सख्त नजर
- मुरादाबाद में नशे की हालत में युवकों का खौफनाक ड्रामा, टाटा सफारी ने मचाया कोहराम