मयंक त्रिगुण, ब्यूरो चीफ
Sambhal CJM Court Order-संभल। उत्तर प्रदेश के संभल में पिछले साल नवंबर में भड़की हिंसा की आग भले ही शांत हो गई हो, लेकिन न्याय की कानूनी लड़ाई ने अब एक नया और बेहद गंभीर मोड़ ले लिया है। संभल की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) कोर्ट ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए तत्कालीन क्षेत्राधिकारी (CO) अनुज चौधरी समेत 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का कड़ा आदेश दिया है। यह आदेश केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उन दावों पर बड़ा सवालिया निशान है जिसमें पुलिस को बेदाग बताया गया था।
साक्ष्यों की वह ‘गोली’ जिसे नजरअंदाज करना कोर्ट के लिए नामुमकिन था
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ पीड़ित युवक के पिता द्वारा पेश किए गए मेडिकल साक्ष्य बने। याचिका के मुताबिक, हिंसा के दौरान युवक को गोली लगी थी, जिसके बाद गिरफ्तारी के डर से पिता ने छिपकर उसका इलाज कराया। अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों में ऑपरेशन के दौरान शरीर से निकाली गई वह ‘गोली’ और मेडिकल रिपोर्ट सबसे अहम सबूत साबित हुए।
अदालत के सामने यह बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि यदि पुलिस का दावा सही था कि उनकी ओर से कोई फायरिंग नहीं हुई, तो युवक के शरीर के भीतर वह सरकारी असलहे जैसी घातक गोली कहाँ से आई? इन्ही दस्तावेजी सबूतों ने खाकी की दलीलों की बुनियाद हिला दी।
न्याय की गुहार और ‘अभियुक्त’ बनने का खौफनाक सफर
अधिवक्ता कमर आलम ने इस मामले में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। उनके अनुसार, जैसे ही पीड़ित परिवार ने पुलिस के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू की और 4 फरवरी 2025 को याचिका दायर की, उसके कुछ समय बाद ही पुलिस ने पीड़ित युवक को ही संभल हिंसा के पुराने मामले में ‘अभियुक्त’ बना दिया।
यह घटनाक्रम इस ओर इशारा करता है कि न्याय मांग रहे परिवारों को किस तरह के दबाव और कानूनी चक्रव्यूह का सामना करना पड़ता है। 15 से अधिक बार हुई लंबी बहसों और 11 महीनों की जद्दोजहद के बाद आया यह अदालती आदेश उन लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो खुद को व्यवस्था के सामने लाचार महसूस कर रहे थे।
प्रशासनिक अड़ियलपन बनाम न्यायिक सक्रियता
कोर्ट के इस सख्त रुख के बावजूद प्रशासन के तेवर अभी भी नरम नहीं पड़े हैं। संभल के एसपी कृष्ण बिश्नोई का स्पष्ट कहना है कि पूर्व में हुई ‘ज्यूडिशियल इंक्वायरी’ में पुलिस की कार्रवाई को सही पाया गया था, इसलिए वे इस आदेश के खिलाफ अपील करेंगे और फिलहाल मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा।
यह स्थिति एक बड़े ‘कानूनी टकराव’ (Legal Standoff) को जन्म दे रही है। एक तरफ पीड़ित के पास कोर्ट का आदेश है, तो दूसरी तरफ पुलिस अपनी पुरानी जांच रिपोर्ट का हवाला देकर कवच तैयार कर रही है। अब सवाल यह है कि क्या एक प्रशासनिक जांच, कोर्ट द्वारा संज्ञान लिए गए आपराधिक आरोपों को रोकने का आधार बन सकती है?
वर्दी पर दाग या निष्पक्ष जांच की शुरुआत?
संभल हिंसा में पांच लोगों की जान गई थी। पुलिस शुरू से ही इस बात से इनकार करती रही है कि मौतें पुलिस की गोली से हुई हैं। लेकिन अब, जब 12 पुलिसकर्मियों पर एफआईआर की तलवार लटक रही है, तो उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। अधिवक्ता कमर आलम का कहना है कि यह आदेश न्याय व्यवस्था में आम आदमी के भरोसे को मजबूत करेगा।
7 दिनों के भीतर एफआईआर की कॉपी कोर्ट में पेश करने का समय दिया गया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि संभल पुलिस अपने ही आला अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करती है या यह कानूनी लड़ाई किसी बड़ी अदालत की दहलीज तक खिंचती चली जाएगी।