मयंक त्रिगुण, ब्यूरो चीफ
सीतापुर जिले में एक दिल दहला देने वाली घटना ने सबको झकझोर दिया है। यहां एक बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। परिवार वालों का कहना है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की ड्यूटी का बढ़ता बोझ उन्हें मानसिक रूप से तोड़ रहा था। इस घटना से पूरे इलाके में हड़कंप मच गया है। लोग हैरान हैं कि आखिर काम का दबाव इंसान को इतना मजबूर कैसे कर सकता है। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है, लेकिन परिवार वाले न्याय की मांग कर रहे हैं।
अनुदेशक ने क्यों चुना मौत का रास्ता?
सीतापुर के अटरिया थाना क्षेत्र में रहने वाले अनुदेशक उमेश शुक्ला ने फंदा लगाकर सुसाइड कर लिया। उनके चचेरे भाई दिनेश शुक्ला ने बताया कि SIR के काम का इतना दबाव था कि उमेश टूट गए। कमरे में शव के पास टेबल पर लिस्ट और कागज बिखरे पड़े थे। आज ही फॉर्म जमा करने का आखिरी दिन था, लेकिन काम पूरा नहीं हो पाया। दिनेश कहते हैं, “भाई दिन-रात काम कर रहे थे, लेकिन बोझ इतना था कि वे सहन नहीं कर पाए। इसी वजह से उन्होंने यह कदम उठाया।” उमेश किराए के कमरे में अकेले रहते थे, जहां यह दुखद घटना घटी।
काम का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था। SIR ड्यूटी में मतदाता सूची की जांच और अपडेट का काम होता है, जो काफी जटिल और समय लेने वाला है। उमेश जैसे कई कर्मचारी इस बोझ तले दबे हुए हैं। परिवार का कहना है कि ऊपर से लगातार फोन आते थे, डेडलाइन का प्रेशर था। जब काम पूरा नहीं होता, तो डांट-फटकार मिलती। इसी तनाव ने उमेश को मौत के मुंह में धकेल दिया। पड़ोसी बताते हैं कि उमेश आमतौर पर मिलनसार थे, लेकिन पिछले कुछ दिनों से चुप-चुप रहने लगे थे। कोई सोच भी नहीं सकता था कि इतना बड़ा कदम उठा लेंगे।
पड़ोसियों की आशंका और पुलिस का एक्शन
उमेश पूरे दिन अपने कमरे से बाहर नहीं निकले, तो पड़ोसियों को कुछ गड़बड़ लगा। वे दरवाजा खटखटाते रहे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। आखिरकार, उन्होंने पुलिस को फोन किया। पुलिस टीम मौके पर पहुंची और दरवाजा खुलवाने की कोशिश की, लेकिन लोहे का दरवाजा बंद था। कोई तरीका न सूझा, तो पुलिस ने दरवाजा काटकर अंदर घुसना पड़ा। अंदर का नजारा देखकर सबके होश उड़ गए। उमेश का शव पंखे से मफलर के फंदे पर लटक रहा था। पुलिस ने तुरंत शव को नीचे उतारा और पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया। यह घटना गुरुवार देर शाम की है, जब इलाका शांत था और अचानक सायरन की आवाज से गूंज उठा।
कौन थे उमेश शुक्ला?
उमेश शुक्ला सिर्फ 30 साल के थे। वे रामपुर कला थाना क्षेत्र के पलिया गांव के रहने वाले थे। पिता काशी प्रसाद शुक्ला के बेटे उमेश अटरिया कस्बे में किराए के मकान में रहते थे। वे पूर्व माध्यमिक विद्यालय दरियापुर में अनुदेशक के तौर पर काम करते थे। 2013 में उन्होंने नौकरी जॉइन की थी। स्कूल के साथी बताते हैं कि उमेश मेहनती थे, बच्चों को पढ़ाना पसंद करते थे। लेकिन SIR ड्यूटी ने उनकी जिंदगी बदल दी। यह ड्यूटी चुनाव आयोग की तरफ से मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए दी जाती है, जो अक्सर अतिरिक्त बोझ बन जाती है। उमेश जैसे कई कर्मचारी इसकी शिकायत करते हैं, लेकिन सिस्टम में बदलाव नहीं आता।
लोगों ने बताया कि गुरुवार सुबह से ही उमेश अपने कमरे में काम कर रहे थे। वे बाहर नहीं निकले, न चाय पीने आए, न किसी से बात की। देर शाम तक जब कोई हलचल नहीं हुई, तो पड़ोसियों ने चिंता की। उन्होंने दरवाजा खटखटाया, आवाज दी, लेकिन सन्नाटा। आखिरकार, पुलिस और परिवार को खबर की गई। परिवार वाले दूर गांव से आए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
कमरे में मिले सबूत और परिवार का दर्द
पुलिस जब अंदर घुसी, तो कमरे में सब कुछ बिखरा पड़ा था। शव के पास SIR से जुड़े कागज, मतदाता लिस्ट और फॉर्म पड़े थे। काम अधूरा था, जो दबाव की कहानी बयां कर रहा था। पास में ही उमेश का फोन रखा था, शायद आखिरी कॉल्स का इंतजार कर रहा था। दिनेश शुक्ला ने आंसू भरी आंखों से कहा, “भाई को बचाया जा सकता था, अगर काम का बोझ कम होता। ऊपर वाले अफसरों को सोचना चाहिए कि इंसान मशीन नहीं है।” परिवार अब जांच की मांग कर रहा है, ताकि ऐसे मामलों को रोका जा सके।
यह घटना सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि सिस्टम की खामियों की ओर इशारा है। SIR जैसी ड्यूटी में कर्मचारियों पर इतना प्रेशर क्यों? क्या चुनाव आयोग इस पर ध्यान देगा? सीतापुर में लोग अब इस मुद्दे पर बात कर रहे हैं। कई कर्मचारी कहते हैं कि वे भी इसी दबाव से गुजर रहे हैं। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसी घटनाएं बढ़ सकती हैं। पुलिस ने कहा है कि जांच जारी है, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई होगी। लेकिन परिवार को इंसाफ का इंतजार है।
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